cars delhi

दिल्ली के प्रदुषण के लिए ३ अरब डॉलर्स का समाधान- पर क्या यह कारगर होगा?

जून २०१६ में शहरी विकास मंत्रालय ने दिल्ली में बढ़ते वाहन जनित प्रदुषण को कम करने के लिए १९,७६२ करोड़ रूपए (२.९५ अरब डॉलर्स) की एक योजना घोषित की है| अनुमोदित होने पर यह प्रस्ताव दिल्ली शहर के बढ़ते मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग के ८८ लाख वाहनों से निकलते प्रदुषण को कम करने का प्रयत्न करेगा| वाहन उत्सर्जित प्रदुषण के आय वर्ग पर निर्भरता के बावजूद ये सुधार अपेक्षित हैं:

  • सात प्रारंभिक पार्किंग प्रबंधन जिले
  • २०७ मेट्रो स्टेशनों का अन्य सार्वजनिक परिवहन सेवाओं से एकीकरण
  • साइकिलिंग पथ एवं हर २५० मीटर पर क्रोसिंग वाले फूटपाथ जिसमे पैदल चलने वालों को पर्थ्मिकता, का निर्माण|
  • शहर में जाम बिन्दुओं का निष्काशन|
  • पहले २००० नयी बसों और अगले फेज में ४००० नयी बसों की खरीद
  • अत्याधिक सघन रास्तों पे बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम का विकास
  • निजी वाहनों को हतोत्साहित करने हेतु पार्किंग फीस एवं भीड़ नियंत्रण कर

हालाँकि इनमे से कुछ सुझाव जैसे की पार्किंग प्रबंधन जिले और भीड़ नियंत्रण कर लागु करना, वाहनों के उपयोग को कम कर सकता है पर बाकी की योजना शहर के माहौल और आय वर्ग के प्रतिच्छेदन को नज़रंदाज़ करती है| आशेर घेर्त्नेर और सुनालिनी कुमार जैसे विद्वानों का मानना है की अतीत में दिल्ली की परयावरण योजनायें “बौर्गेओइस एनवायरनमेंटलिस्म” के कारण असफल रही है| अर्थात मध्यम वर्ग के पूर्वाग्रह और हितों के सामने सार्वजनिक हितों के लिए प्रस्तावित पर्यावरण योजनायें कमज़ोर पड़ जाती हैं|

मंत्रालय के वायु प्रदुषण प्रस्ताव भी इस समस्या से परे नहीं है और अधिकतर बस एवं मेट्रो विस्तार पर केन्द्रित हैं| आज के समय में कार एक वास्तविक ज़रूरत नहीं है बल्कि वर्ग, प्रतिष्ठा और हैसियत का एक प्रतीक मात्र है| २००१ में दिल्ली में ९ लाख पंजीकृत वाहन थे| आज वे २६ लाख से भी ज्यादा हैं| हालाँकि शहर की आबादी के सामने ये एक छोटा अंक है पर कारों के बढ़ते उपयोग से घुटते इस शहर पे नयी बसों और मेट्रो लाइन्स से कोई बड़ा प्रभाव पड़ना असंभाव्य ही है| जनवरी २०१६ में उच्च न्यायलय ने भी इस समस्या स्वीकार को किया जब उन्होंने डीऍमआरसी को दिल्ली मेट्रो में “प्रीमियम” वर्ग सेवा के विकल्प का समन्वेषण करने का निर्देश दिया, जिससे समृद्ध वर्ग भी मेट्रो की ओर आकर्षित हो|

२००८ में भी हमने देखा था की बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम मध्यम वर्ग को सार्वजनिक परिवहन की ओर आकर्षित करने में असफल रहा था, जिसमे की बस के लिए समर्पित लेन बनाने हेतु कारों की लेन को तीन से दो कर दिया गया था| इस योजना का समर्थन करने के बजाय बस मार्ग के आसपास की कोलोनियों में रहने वाले मध्यम वर्गीय पत्रकारों ने बीआरटी के विरुद्ध एक नकारात्मक अभियान शुरू किया| ये अभियान इस बात पर केंत्दित था की समर्पित बस लेन के कारण कारों में यात्रा का समय २० मिनट बढ़ गया, जिससे कार से यात्रा करने वालों को दिक्कतें हुईं| यह वितर्क उच्च न्यायलय तक गया और एक कार्यकर्ता ने तर्क रखा की बीआरटी सिस्टम ने शहर के कारों से यात्रा करने वाले धन सर्जकों को नज़रंदाज़ किया है| इन नए प्रस्तावों में सार्वजनिक परिवहन के विरुद्ध इस प्रतिक्रिया को ध्यान में नहीं रखा गया है|

साथ ही कारों के आलावा वायु प्रदुषण के बड़े कारण जैसे ट्रक और दो पहिया वाहनों को भी नज़रंदाज़ किया गया है, जो की पीऍम२.५ में क्रमशः २४-३५ प्रतिशत और १८ प्रतिशत का योगदान करते हैं| कारों का योगदान इसमें १४-१५ प्रतिशत ही है| सार्वजनिक परिवहन से दो पहिया वाहन चालकों को आकर्षित किया जा सकता है जो की सामान्यतः निचले मध्यम वर्ग से होते हैं परन्तु ट्रक के उपयोग में इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा| ट्रक और दू पहिया वाहनों को प्रभावित करने वाली कोई नीति इन प्रस्तावों में नहीं है|

अंततः दिल्ली के वायु प्रदुषण समाधानों में एक व्यापक परिप्रेक्ष्य और प्रोत्साहन मॉडल की आवश्यकता है जिसमे विभिन्न वाहन चालकों के व्यय्हार को ध्यान में रखा गया हो| दिल्ली में प्रदुषण कम करने के लिए विपणन और मापदंड बनाने होंगे जिससे प्रबंधक, सीईओ, संसद सदस्य और अन्य मध्यम एवं उच्च वर्ग के नागरिक सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता दें| यह कोई असंभव विचार नहीं है, बल्कि न्यू यॉर्क और लन्दन जैसे शहरों में यह एक सामान्य बात है| हालाँकि वयव्हारिक झुकावों के साथ ऐसी नीतियों की आवश्यकता है जिनसे कार खरीदना मेहेंगा हो, खासकर दूसरी कार| एक बड़ा उधारण सिंगापुर का वाहन कोटा सिस्टम है जिसमे वाहनों की कीमत ३-५ गुना बढ़ जाती है और सार्वजनिक परिवहन एक आकर्षक विकल्प बन जाता है| दू पहिया वाहनों के लिए भी ये नीति होनी चाहिए और ट्रक समेत सभी वाहनों पे सख्त प्रदुषण नियम लागू होने चाहिए|

समय आ गया है की हम ऐसे नियम बनाए जो सभी पर लागू हों ना की सिर्फ गरीबों पर| जिस तरह निचले वर्ग के रिक्शा चालकों पे सीअनजी थोपी गई है और ३० लाख झोप्पर्पट्टी निवासियों को ज़मीनी प्रदुषण के लिए बेघर किया गया है वैसे ही ऐसी नीतियों की आवश्यकता है जिनसे मध्यम और उच्छ वर्ग को पर्यावरण सुधार के लिए प्रेरित किया जा सके| हालंकि सार्वजनिक परिवहन का विस्तार एक अच्छी नीयत वाली योजना है, यह पूर्ण समाधान नहीं है| शहरी विकास मंत्रालय को संस्कृति, व्यव्हार और मानकों पे गहन विचार की आवश्यकता है ताकि विपणन एवं व्यावहारिक अर्थशाश्त्र की इस तेज़ी से बढती दुनिया का उपयोग करके यथास्तिथि में बदलाव लाया जा सके|

Bhumi spent several years working with small-holder farmers in India, Kenya, and Sierra Leone. She recently returned to India to work on governance reforms. She helps Smart Air with social media outreach, grant proposals, and anything else that comes along.

3 thoughts on “दिल्ली के प्रदुषण के लिए ३ अरब डॉलर्स का समाधान- पर क्या यह कारगर होगा?

  1. 1. All cities above 10L population should introduce mandatory RFID tagging of vehicles. Work with industry and govt departments to use the same tag for multiple purposes like vehicle registration, congestion monitoring, entry tolls, vehicle pollution records, maintenance and service records, police and criminal records, traffic violations etc. 2. New vehicles can be tagged at factory. Old vehicles can be tagged at petrol pumps and authorized service stations. Provide 6 to 9 months of time for all vehicles to get tagged. Old untagged vehicle from outside can be tagged at the entry tolls/ checkpoint to the city (or govt can run it as a national program and not just for big cities.)
    3. RFID tags should be linked to an owner database and a payments system (ideally common to all govt and major utility payments).
    4. Introduce a carbon tax on all transport. Collect it as a tax while buying the carbon (fuel).
    5. Use the tags to implement dynamic pricing of road usage, congestion charging, parking fees. In the beginning, it can be based on fixed hours (peak/off peak) and workday/weekend. Automatically collected from linked payment accounts. No need to stop to pay toll or congestion charge. Except at the very top, there is a price elasticity to the regular commuter. People trying to avoid paying the fees by not filling their wallets can simply be stopped at the next intersection and fined 2-5 times the unpaid amount. (Easy to identify vehicles as the system already has all details of the vehicle and its registration number. Vehicles coming in without tags can be captured by number plate cameras.)
    6. Fix the number of new vehicles – cars and two wheelers – permitted per year on the roads. Let these be auctioned. Plough back the auction proceeds into improving and marketing public transport. Reduce the number of permits every year, with an aim to reduce number of vehicles in metros. The permit should be in units of pollution. So, buying a higher emissions vehicle costs you more.

    7. Cost of implementation gets funded by additional cess on fuel. Plough back ALL the money collected through carbon tax, congestion/ road use toll, and new vehicle permits into three things-
    a.) improvement in public infrastructure, and
    b.) funding for electric vehicle research and charging infrastructure, tax incentives for electric vehicles.
    c.) incentives for replacing old vehicles, especially for old commercial vehicles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *